संतकबीरनगर। दहेज हत्या के आरोपी पति और सास को अपर सत्र न्यायाधीश, एफ०टी०सी०-द्वितीय, डॉ० दिब्यानन्द द्विवेदी ने दोष मुक्त किये जाने का फैसला सुनाया है।
बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता फौजदारी अमित कुमार उपाध्याय ने की थी बहस
प्रकरण के अनुसार वादी मुकदमा विनोद कुमार केवट (निवासी नेवारी, थाना लालगंज, जनपद बस्ती) ने थाना बेलहरकलां में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि उनकी पुत्री नीलम निषाद की शादी 20 मई 2021 को महेन्द्र निषाद पुत्र झीनक प्रसाद (निवासी बेलवा ठकुराई, थाना बेलहरकलां) के साथ हुई थी। तहरीर में आरोप लगाया गया था कि ससुराल पक्ष के लोगों द्वारा दो लाख रुपये नकद एवं पल्सर मोटरसाइकिल की मांग को लेकर मृतका को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना दी गई तथा 26 जून 2021 को गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई। इस आधार पर पुलिस ने मु०अ०सं० 109/2021, धारा 498A, 304B, 302 भा०दं०सं० एवं 3/4 डी०पी० एक्ट के तहत मुकदमा पंजीकृत किया था।
बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता फौजदारी अमित कुमार उपाध्याय ने बहस किया कि वादी पक्ष द्वारा प्रथम सूचना रिपोर्ट में मृतका की हत्या गला दबाकर किए जाने का गंभीर आरोप लगाया गया था, जबकि मौके पर तैयार किए गए पंचायतनामा (जिस पर मृतका की माता व परिजनों के हस्ताक्षर/अंगूठा है) तथा पोस्टमार्टम एवं बिसरा रिपोर्ट में गला दबाने जैसी किसी भी चोट की पुष्टि नहीं हुई। बिसरा जांच में एल्युमिनियम फास्फाईड (विषैला पदार्थ) पाए जाने की पुष्टि हुई, जिससे वादी पक्ष का यह दावा पूरी तरह निराधार साबित हुआ कि मृतका की गला दबाकर हत्या की गई थी।चिकित्सक के साक्ष्य और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतका के शरीर पर बाहरी या अंदरूनी चोट का कोई भी निशान नहीं पाया गया। इससे अभियुक्तगण पर लगाए गए मारपीट और शारीरिक प्रताड़ना के आरोप स्वतः खारिज होते नजर आए।
विवेचना के दौरान विवेचक व पुलिस अधिकारियों तथा ग्राम बेलवा ठकुराई के स्वतंत्र ग्रामीणों के बयानों से यह स्पष्ट हुआ कि मृतका का विवाह पूर्णतः हर्षोल्लास एवं राजी-खुशी के साथ संपन्न हुआ था। विवाह के पूर्व या पश्चात दहेज की कोई मांग नहीं की गई थी और न ही किसी प्रकार की क्रूरता का कोई साक्ष्य मिला। विवेचना के दौरान वादी द्वारा बनाए गए अन्य नामजद अभियुक्तों (सिकन्दर, संतू एवं प्रेमचन्द) के विरुद्ध कोई साक्ष्य न मिलने पर उन्हें पूर्व में ही आरोप-मुक्त किया जा चुका था।

(वरिष्ठ अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय)
बचाव पक्ष के अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय द्वारा अदालत के समक्ष ‘गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’, ‘संदीप कुमार बनाम उत्तराखण्ड राज्य’, ‘कहकशा कौसर बनाम बिहार राज्य’ तथा ‘प्रदीप कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ सहित कई महत्वपूर्ण नजीरें प्रस्तुत की गईं, जिनमें यह स्थापित किया गया है कि बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के केवल सामान्य व सरसरी आरोपों के आधार पर ससुराल पक्ष के परिजनों को दण्डित नहीं किया जा सकता।
दहेज हत्या के इस मुकदमे में वरिष्ठ अधिवक्ता अमित कुमार उपाध्याय ने जिस प्रकार से अभिलेखीय साक्ष्यों का सूक्ष्म विश्लेषण किया, और गवाहों की जिरह से मुकदमे के अंतर्विरोधों को उजागर किया तथा कानून के स्थापित सिद्धांतों को प्रभावी ढंग से रखा, वह विधि जगत के लिए एक उत्कृष्ट उदाहरण है। आरोपी पति लगभग 5 वर्षों से कारागार में निरुद्ध था। आज इस आरोप दोषमुक्त होने पर परिवार ने राहत की सांस ली है।


