
नई दिल्ली। ईरान में शुरू हुए अमेरिका-इजरायल के युद्ध को आज 31 दिन हो गए हैं। लेकिन दोनों में से कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं है। हमेशा की तरह ट्रंप अपने बयानों से पलट रहे हैं, लेकिन वह एक बात पर अडिग हैं कि ईरान के पास न्यूक्लियर हथियार नहीं होने चाहिए।

इस एक जिद ने दुनिया को एक ऐसे मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जहां जल्दग ही न्यूक्लियर पावर बनने की रेस शुरू होने वाली है। ट्रंप के इस कदम ने एक ऐसा न्यूक्लियर जिन्न बाहर ला दिया है, जिसे वापस बोतल में डालना मुश्किल होगा। अपने मकसद को हासिल करने के लिए अमेरिका ने पहले भी ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे। ट्रंप का कहना है कि अगर ईरान के पास परमाणु हथियार होंगे, तो मिडिल ईस्ट में कभी भी शांति नहीं हो पाएगी। ट्रंप का ये डर सिर्फ उनके दिमाग की उपज ही नहीं है। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, ईरान ने 408.6 किलोग्राम यूरेनियम को 60 फीसदी तक एनरिच कर लिया है। इतना यूरेनियम 9 वॉरहेड में इस्तेमाल करने के लिए काफी है। IAEA का ये भी कहना है कि ईरान के पास 200 किलो तक 20 फीसदी फिसाइल मैटेरियल भी है, जिसे आसानी से 90 प्रतिशत वेपन-ग्रेड यूरेनियम में बदला जा सकता है।
ईरान ने मिडिल ईस्ट में खुद को शक्तिशाली बनाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। उसके पास करीब 2500 बैलेस्टिक मिसाइलें हैं, जो मिडिल ईस्ट में सबसे ज्यादा हैं। वह पूरे इलाके में आतंकवादी प्रॉक्सी को समर्थन देता है, जिससे उसकी रक्षा क्षमता में इजाफा हुआ। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ईरान पर अमेरिका का हमला भले ही कुछ समय के लिए उसकी न्यूक्लियर पावर बनने की महत्वाकांक्षाओं को धीमा कर दे, लेकिन अगर वहां का शासन इस युद्ध में बच गया, तो वह परमाणु हथियार हासिल करने के लिए और भी दृढ़ हो जाएगा, क्योंकि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए उसके पास यही एकलौता साधन होगा। इन उपजी स्थितियों के लिए सिर्फ ईरान का पागलपन ही जिम्मेदार नहीं है। अमेरिका और खासकर ट्रंप ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है। पहले अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु संधि की और फिर ट्रंप ने हाथ पीछे खींच लिए। ट्रंप ईरान को बातचीत के मंच पर भी लेकर आए और फिर उसी दौरान उस पर हमला कर दिया।





