
नई दिल्ली। तीन सूबों में मात्र एक एक विधान सभा क्षेत्रों में उप चुनाव के राष्ट्रीय स्तर पर रोमांचक मुकाबले में बीजेपी दो राज्यों में चुनाव हार गई है। इसे कई मायनों में खास समझा जा रहा है। जिन तीन राज्यों में चुनाव हुए हैं, वे सभी भाजपा शासित हैं। मजे की बात यह है कि अभी तक ईवीएम पर किसी ने सवाल नहीं उठाए हैं। वैसे तो सीटें तीनों महत्वपूर्ण थीं। लेकिन बिहार की बांकीपुर सीट का चुनाव खासा चर्चा में रहा। क्योंकि यहां मैनेजमेंट गुरु पीके यानि प्रशान्त किशोर खुद चुनाव मैदान में थे। इन्हें हराना भाजपा के लिए मुख्य चुनौती थी, जिसके चलते भाजपा ने अन्तिम समय में नये प्रत्याशी नीरज कुमार को उतार दिया था। दोनों लोग पहली बार चुनाव लड़े थे। यहां जन सुराज के प्रशान्त किशोर ने 19 हजार वोटों से जीत दर्ज की। वहीं दतिया में कांग्रेस के घनश्याम सिंह और मांजलपुर में भाजपा के सतेन्द्र भाई पटेल ने जीत दर्ज की है।

(भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार एवं विजयी प्रशांत किशोर)
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी के नीरज कुमार दूसरे नंबर पर रहे। इस सीट पर प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले हैं। दूसरे स्थान पर बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार रहे हैं जिन्हें 44,827 वोट मिले हैं। यानी प्रशांत किशोर ने ये सीट 19,324 मतों से जीती है। आरजेडी की रेखा कुमारी को 14,273 वोट मिले हैं। बांकीपुर सीट पटना के शहरी इलाक़े में मौजूद है और इसे बीजेपी का मज़बूत गढ़ माना जाता है। इस सीट से बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन विधायक थे।

(दतिया सीट से विजई कांग्रेस के घनश्याम सिंह व भाजपा के आशुतोष तिवारी)
मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी के आशुतोष तिवारी कांग्रेस के घनश्याम सिंह से हार गए हैं। सभी 15 राउंड की गिनती के बाद कांग्रेस के घनश्याम सिंह को 66757 मत मिले जबकि आशुतोष तिवारी को 60741 वोट मिले हैं। उधर गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी के सतेंद्रभाई पटेल जीत गए हैं। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार भीखाभाई रबाड़ी को 30630 मतों से हराया। इन सीटों पर 30 जुलाई को वोटिंग हुई थी।

आमतौर पर विधानसभा उपचुनाव को लेकर बहुत ज़्यादा उत्साह नहीं देखा जाता है, लेकिन इस बार बांकीपुर में जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ख़ुद चुनाव मैदान में उतरे और इस वजह से इसके नतीजे पर कई लोगों की नज़र है। इस पूरे घटनाक्रम पर प्रशांत किशोर का कहना था कि जनता के पास अब विकल्प आ गया है तो बीजेपी को अब उम्मीदवार नहीं मिल रहा है।

(गुजरात में विजयी भाजपा के सतेन्द्र भाई पटेल एवं कांग्रेस के भीखाभाई रबारी)
गुजरात की मांजलपुर विधानसभा सीट पर 30 जुलाई को हुए उपचुनाव में 37.5% मतदान हुआ। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां 63.61% मतदान दर्ज किया गया था। बीजेपी के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री योगेश पटेल के 2 जून को लंबी बीमारी के बाद निधन के कारण इस सीट पर उपचुनाव कराया गया। मांजलपुर में मुख्य मुक़ाबला बीजेपी के उम्मीदवार सतेंद्रभाई पटेल और कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष एवं पूर्व मंत्री भीखाभाई रबारी के बीच था। योगेश पटेल गुजरात की राजनीति के प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। वे आठ बार विधायक चुने गए। उन्होंने 1990 से 2007 तक पांच बार वडोदरा की रावपुरा सीट का प्रतिनिधित्व किया। परिसीमन के बाद वे मांजलपुर सीट से चुनाव मैदान में उतरे और 2012, 2017, 2022 में लगातार जीत दर्ज की। इस तरह उन्होंने 36 वर्षों के राजनीतिक सफर में विधानसभा चुनावों में लगातार आठ जीत हासिल की। कांग्रेस ने इस उपचुनाव को इस सीट पर लंबे समय से चली आ रही बीजेपी की पकड़ को तोड़ने के मौक़े के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। मध्य प्रदेश में बीजेपी ने इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया था। साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को 7,500 से अधिक मतों से हराया था।

हालांकि, दिल्ली की एक अदालत ने अप्रैल में धोखाधड़ी के एक मामले में भारती को तीन वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई थी, जिसके बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई और दतिया सीट पर उपचुनाव कराए गए। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व और पार्टी के चुनावी प्रबंधन की भी इस चुनाव के ज़रिए परीक्षा मानी जा रही थी। कांग्रेस के लिए भी यह उपचुनाव काफ़ी अहम था। पार्टी पिछले लगभग एक वर्ष से संगठन को मज़बूत करने और नए नेतृत्व को आगे बढ़ाने पर ज़ोर दे रही है। कांग्रेस की ओर से घनश्याम सिंह को चुनाव लड़ाया गया। आजाद समाज पार्टी ने दामोदर सिंह यादव को मैदान में उतारकर मुक़ाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास किया। मगर मुख्य लड़ाई बीजेपी और कांग्रेस के बीच थी। इस उपचुनाव के नतीजे से प्रदेश सरकार की स्थिरता या विधानसभा में बहुमत पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन अगले साल प्रस्तावित नगर निकाय और पंचायत चुनावों की रणनीति तय करने में इसका असर हो सकता है।





